Bharat Mata Ki Jai

Bharat Mata Ki Jai
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी.

Saturday, 25 May 2013

" मै एक खोटा सिक्का "



maOM ek KaoTa isa@ka basa ek KaoTa isa@ka hUÐ .

ijasa doSa maoM maOMnao janama ilayaa Ê
]sa doSa ko ilae naa kuC kr payaa Ê
damana maoM Barnao qao fUla jahaÐ Ê
]sa damana maoM naa kuC Bar payaa .

ijasa rja –  kNa maoM Kola ba=a huAa Ê
ijasa Qara ka [tnaa Pyaar imalaa Ê
]sa gagana kao kaOna saa mauÐh idKlaa}M Ê
hrdma ijasako saayao maoM maOM plaa baZa .

maO AakaxaaAaoM ka vaao jalata dIp hUÐ Ê
jaao ApnaI hI laaO maoM jala rha hUÐ Ê
naa jaanao iksa dsaa maoM AaOr khaÐ hUÐ Ê
iksa WMd ko dMSa maoM jala rha hUÐ .



maoro )dya maoM basa eosaI jyaaoit jalaa dao Ê
maoro r@t ka kNa –  kNa kama Aayao doSa ko Ê
maOM banakr AdBaut icaraga inaja doSa ka Ê
cahuÐ Aaor sauKd raoSanaI maOM fOlaa} .

kivata nahIM hO yao maoro idla kI Aavaaja hO Ê
kba AayaogaI yao ijandgaI doSa ko kama Ê
maorI hr saaÐsa maoM basa yahI firyaad hO Ê
maOM ek KaoTa isa@ka basa ek KaoTa isa@ka hUÐ .
                               
                                   –  santaoYa kumaar



Friday, 22 March 2013

शहीदे आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव



भगत सिंह के जीवन का सबसे रोमांचक प्रसंग वह रहा होगा जब फांसी से दो घंटे पहले उनके वकील प्राणनाथ मेहता उनसे मिलने आये थे और उन्होंने भगत सिंह से पूछा था कि क्या वह देश के लिए कोई संदेश देना चाहेंगे? भगत सिंह का उत्तर था, आप मेरे दो नारे उस तक पहुंचाएं एक साम्राज्यवाद खत्म हो (डाउन विद इम्पीरिलिज्म) और दूसरा इंकलाब जिंदाबाद (लांगलिव रेवोल्यूशन) ।

श्री मेहता ने उनसे पूछा कि आज तुम कैसे हो? तो भगत सिंह ने कहा कि हमेशा की तरह खुश हूं।

 उन्होंने पूछा कि क्या तुम्हें किसी चीज की इच्छा है तो भगत सिंह बोले कि हां, मैं दुबारा इस देश में पैदा होना चाहता हूं ताकि इसकी सेवा कर सकूं। एक अन्य प्रसंग में जब भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी के तख्ते की ओर ले जाया जा रहा था, तो जेल का वार्डन चरत सिंह उनके कान में फुसफुसाया, ‘वाहेगुरु से प्रार्थना कर लो’। भगत सिंह इस पर हंसकर बोले, ‘मैंने पूरी जिंदगी परमात्मा को कभी याद नहीं किया बल्कि उसे दुखियों और गरीबों की वजह से कोसा जरूर है। अब अगर मैं उससे माफी मांगूगा तो वह कहेगा कि यह बुजदिल है जो माफी चाहता है, क्योंकि इसका अंत निकट है।

शहीदे आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने हँसते-हँसते भारत की आजादी  के लिए 23 मार्च 1931 को 7:23 बजे सायंकाल फाँसी का फंदा चूमा था। 
फांसी पर जाते समय वे तीनों गा रहे थे -


दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फ़तमेरी 

मिट्टी से भी खुस्बू ए वतन आएगी । 


उस समय तक ‘वन्देमातरम्’ सभवत: सभी क्रान्तिकारियों का सबसे प्रिय नारा था। भगत सिंह भी इसका उपयोग करते थे। इसी के साथ उन्होंने नौजवानों को नारा दिया ‘इंकलाब जिन्दाबाद’ फांसी से कुछ दिन पहले, 2 फरवरी 1931 को भगत सिंह ने अपने साथी नौजवानों को एक संदेश भेजा था। जिसमें उन्होंने कहा था कि इंकलाब जिंदाबाद का नारा हमारे लिए बहुत पवित्र है। इसका प्रयोग हमें बहुत सोच-समझकर करना चाहिए। इस देश के क्रान्तिकारियों की लम्बी सूची हैं। उनकी संख्या भी कम नहीं है जो फांसी पर चढ़े, किन्तु भगत सिंह सिर्फ क्रान्तिकारी नहीं थे। वह अपने आप में पूरा विचार भी थे।



भगत सिंह प्रायः यह शेर गुनगुनाते रहते थे-

जबसे सुना है मरने का नाम जिन्दगी है
सर से कफन लपेटे कातिल को ढूँढ़ते हैं।। 


फ़ासी के पहले ३ मार्च को अपने भाई कुलतार को लिखे पत्र में भगत सिह ने लिखा था -
उसे यह फ़िक्र है हरदम तर्ज़-ए-ज़फ़ा (अन्याय) क्या है,
हमें यह शौक है देखें सितम की इंतहा क्या है,
दहर (दुनिया) से क्यों ख़फ़ा रहें,चर्ख (आसमान) से क्यों ग़िला करें,
सारा जहां अदु (दुश्मन) सही, आओ मुक़ाबला करें
।
इससे उनके शौर्य का अनुमान लगाया जा सकता है। शहीद भगत सिंह सदा ही शेर की तरह जिए. चन्द्रशेखर आजा़द से पहली मुलाकात के समय ही जलती मोमबती की लौ पर हाथ रखकर उन्होने कसम खाई कि उनका जीवन वतन पर ही कुर्बान होगा।
उसे यह फ़िक्र है हरदम,
नया तर्जे-जफ़ा क्या है?
हमें यह शौक देखें,
सितम की इंतहा क्या है?
दहर से क्यों खफ़ा रहे,
चर्ख का क्यों गिला करें,
सारा जहाँ अदू सही,
आओ मुकाबला करें।
कोई दम का मेहमान हूँ,
ए-अहले-महफ़िल,
चरागे सहर हूँ,
बुझा चाहता हूँ।
मेरी हवाओं में रहेगी,
ख़यालों की बिजली,
यह मुश्त-ए-ख़ाक है फ़ानी,
रहे रहे न रहे।
                                            - भगत सिंह


भगत सिंह का पत्र सुखदेव के नाम:


भगत सिंह लाहौर के नेशनल कॉलेज के छात्र थे। एक सुंदर-सी लड़की आते जाते उन्हें देखकर मुस्कुरा देती थी। सिर्फ भगत सिंह की वजह से वह भी क्रांतिकारी दल में शामिल हो गई। जब असेंबली में बम फेंकने की बात आई तो भगत सिंह को दल की जरूरत बताकर दल के लोगों ने उन्हें भेजे जाने से इंकार कर दिया। भगत सिंह के अंतरंग मित्र सुखदेव ने उन्हें ताना मारा कि तुम मरने से डरते हो और उस लड़की की वजह से ही ऐसा करने से डर रहे हो। इस आरोप से भगत सिंह का हृदय रो उठा और उन्होंने दोबारा दल की मीटिंग बुलाई और असेंबली में बम फेंकने का जिम्मा जोर देकर अपने नाम करवाया। आठ अप्रैल, 1929 को असेंबली में बम फेंकने से पहले उन्होंने सुखदेव को यह पत्र लिखा था।


प्रिय सुखदेव,


जब तक तुहें यह पत्र मिलेगा, मैं जा चुका होगा-दूर एक मंजिल की तरफ. मैं तुम्हें विश्वास दिलाना चाहता हूं कि आज बहुत खुश हूं। हमेशा से ज्यादा. मैं यात्रा के लिए तैयार हूं, अनेक-अनेक मधुर स्मृतियों के होते और अपने जीवन की सब खुशियों के होते भी, एक बात जो मेरे मन में चुभ रही थी कि मेरे भाई, मेरे अपने भाई ने मुझे गलत समझा और मुझ पर बहुत ही गंभीर आरोप लगाए- कमजोरी का। आज मैं पूरी तरह संतुष्ट हूं, पहले से कहीं अधिक।

आज मैं महसूस करता हूं कि वह बात कुछ भी नहीं थी। एक गलतफहमी थी. मेरे खुले व्यवहार को मेरा बातूनीपन समझा गया और मेरी आत्मस्वीकृति को मेरी कमजोरी। मैं कमजोर नहीं हूं। अपनों में से किसी से भी कमजोर नहीं भाई! मैं साफ दिल से विदा होऊंगा। क्या तुम भी साफ होगे? यह तुम्हारी बड़ी दयालुता होगी, लेकिन ख्याल रखना कि तुम्हें जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहिए। गंभीरता और शांति से तुम्हें काम को आगे बढ़ाना है, जल्दबाजी में मौका पा लेने का प्रयत्न न करना। जनता के प्रति तुम्हारा कर्तव्य है, उसे निभाते हुए काम को निरंतर सावधानी से करते रहना। तुम स्वयं अच्छे निर्णायक होगे। जैसी सुविधा हो, वैसी व्यवस्था करना। आओ भाई, अब हम बहुत खुश हो लें। खुशी के वातावरण में मैं कह सकता हूं कि जिस प्रश्न पर हमारी बहस है, उसमें अपना पक्ष लिए बिना नहीं रह सकता। मैं पूरे जोर से कहता हूं कि मैं आशाओं और आकांक्षाओं से भरपूर हूं और जीवन की आनंदमयी रंगीनियों ओत-प्रोत हूं, पर आवश्यकता के वक्त सब कुछ कुर्बान कर सकता हूं और यही वास्तविक बलिदान है। ये चीजें कभी मनुष्य के रास्ते में रुकावट नहीं बन सकतीं, बशर्ते कि वह मनुष्य हो। निकट भविष्य में ही तुम्हें प्रत्यक्ष प्रमाण मिल जाएगा।

जहां तक प्यार के नैतिक स्तर का संबंध है, मैं यह कह सकता हूं कि यह अपने में कुछ नहीं है, सिवाए एक आवेश के, लेकिन यह पाशविक वृत्ति नहीं, एक मानवीय अत्यंत मधुर भावना है। प्यार अपने आप में कभी भी पाशविक वृत्ति नहीं है। प्यार तो हमेशा मनुष्य के  चरित्र को ऊपर उठाता है। सच्चा प्यार कभी भी गढ़ा नहीं जा सकता. वह अपने ही मार्ग से आता है, लेकिन कोई नहीं कह सकता कि कब। एक युवक और एक युवती आपस में प्यार कर सकते हैं और अपने प्यार के सहारे आवेगों से ऊपर उठ सकते हैं, अपनी पवित्रता बनाए रख सकते हैं। मैं यहां एक बात साफ कर देना चाहता हूं कि जब मैंने कहा था कि प्यार इंसानी कमजोरी है तो यह एक साधारण आदमी के लिए नहीं कहा था। आम आदमी जिस स्तर पर होते हैं, वह एक अत्यंत आर्दश स्थिति है। जब मनुष्य प्यार व घृणा इत्यादि के आवेगों पर काबू पा लेगा, जब मनुष्य अपना आधार आत्मा के निर्देश को बना लेगा, वह स्थिति मनुष्य के लिए अच्छा और लाभदायक होगा। क्या मैं यह आशा कर सकता हूं कि किसी खास व्यक्ति से द्वेष रखे बिना तुम उनके साथ हमदर्दी करोगे, जिन्हें इसकी सबसे अधिक जरूरत है? लेकिन तुम तब तक इन बातों को नहीं समझ सकते जब तक तुम स्वयं उस चीज का शिकार न बनो। मैं यह सब क्यों लिख रहा हूं? मैं बिल्कुल स्पष्ट होना चाहता था। मैंने अपना दिल साफ कर दिया है।

तुम्हारी हर सफलता और प्रसन्न जीवन की कामना सहित,तुम्हारा भाईभगत सिंह







जब-जब हम शहीदे आजम भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव जैसे शहीदों को याद करते हैं तो बरबस ये पंक्तियाँ याद आ ही जाती हैं-


कभी वो दिन भी आयेगा,
कि जब आजाद हम होंगे,
ये अपनी ही जमीं होगी,
ये अपना आसमां होगा,
शहीदों कि चिताओं पर,
लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का,
यही नामों-निशां होगा
।




पुण्यतिथि के अवसर पर देश के इन वीर सपूतों को शत शत नमन !

Wednesday, 20 February 2013

वंदन मेरे देश – तेरा वंदन मेरे देश 
पूजन, अर्चन, आराधन, अभिनन्दन मेरे देश 

तुझसे पाई माँ की ममता 
और पिता का प्यार 
तेरे अन्न, हवा, पानी से 
देह हुई तैयार 
तेरी मिट्टी-मिट्टी कब है, चंदन मेरे देश 
वंदन मेरे देश – तेरा वंदन मेरे देश।

भिन्न-भिन्न भाषाएँ, भूषा 
यद्यपि धर्म अनेक 
किन्तु सभी भारतवासी हैं 
और हृदय है एक 
तुझ पर बलि है, हृदय –हृदय का स्पंदन मेरे देश 
वंदन मेरे देश – तेरा वंदन मेरे देश।

पर्वत, सागर, नदियाँ 
ऐसा दृश्य कहाँ,
स्वर्ग अगर है कहीं धरा पर 
तो है सिर्फ यहाँ 
तू ही दुनियाँ की धरती का वंदन मेरे देश 
वंदन मेरे देश – तेरा वंदन मेरे देश।

Tuesday, 12 February 2013

वह देश कौन-सा है...


मन मोहनी प्रकृति की गोद में जो बसा है। 

सुख स्वर्ग-सा जहाँ है वह देश कौन-सा है।।


जिसका चरण निरंतर रतनेश धो रहा है। 

जिसका मुकुट हिमालय वह देश कौन-सा है।।


नदियाँ जहाँ सुधा की धारा बहा रही हैं। 

सींचा हुआ सलोना वह देश कौन-सा है।।


जिसके बड़े रसीले फल कंद नाज मेवे। 

सब अंग में सजे हैं वह देश कौन-सा है।।


जिसमें सुगंध वाले सुंदर प्रसून प्यारे। 

दिन रात हँस रहे है वह देश कौन-सा है।।


मैदान गिरि वनों में हरियालियाँ लहकती। 

आनंदमय जहाँ है वह देश कौन-सा है।।


जिसके अनंत धन से धरती भरी पड़ी है। 

संसार का शिरोमणि वह देश कौन-सा है।।



                 - रामनरेश त्रिपाठी

Friday, 25 January 2013

मानवता धर्म, सिखलाता गणतंत्र है




सत्य औ अहिंसा का, देता जो मंत्र है
हर्षोल्लास भरा, दिवस गणतंत्र है।

आबाल वृद्ध, नर नारी के, ह्रदय में
देश प्रेम, प्रसारता, हमारा गणतंत्र है।

सेवा, समर्पण और, त्याग भरी भावना
तन मन, धन वारना, सिखाता गणतंत्र है।

नफरत बुराई बैर आदि को मेटता
जन मन में, प्यार को, बढ़ाता गणतंत्र है।

जाति मजहब के, भेद कोई, पाले नहीं
मानवता धर्म, सिखलाता गणतंत्र है।

मानवीय, मूल्यों का, दुनिया में सर्वश्रेष्ठ
संदेश, विश्व शांति का, देता गणतंत्र है।

सुख दुख के, साथी बन, भाईचारा पालें
समरसता पाठ, हमें, पढ़ाता गणतंत्र है।

सर्वजन हिताय है, सर्वजन सुखाय
प्रगति पथ पर अग्रसर, हमारा गणतंत्र है।

मेरे देश को जागृत बनाओ




"मन जहां डर से परे है
और सिर जहां ऊंचा है;
ज्ञान जहां मुक्‍त है;
और जहां दुनिया को
संकीर्ण घरेलू दीवारों से
छोटे छोटे टुकड़ों में बांटा नहीं गया है;
जहां शब्‍द सच की गहराइयों से निकलते हैं;
जहां थकी हुई प्रयासरत बांहें
त्रुटि हीनता की तलाश में हैं;
जहां कारण की स्‍पष्‍ट धारा है
जो सुनसान रेतीले मृत आदत के
वीराने में अपना रास्‍ता खो नहीं चुकी है;
जहां मन हमेशा व्‍यापक होते विचार और सक्रियता में
तुम्‍हारे जरिए आगे चलता है
और आजादी के स्‍वर्ग में पहुंच जाता है
ओ पिता
मेरे देश को जागृत बनाओ"


                           "गीतांजलि"
                           - रवीन्द्रनाथ टैगोर

Saturday, 19 January 2013

महान प्रेरणा स्रोत – "स्वामी विवेकानंद"

भारतीय संस्कृति को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने वाले महापुरुष स्वामी विवेकानंद जी का जन्म 12 जनवरी 1863 को सूर्योदय से 6 मिनट पूर्व 6 बजकर 33 मिनट 33 सेकेन्ड पर हुआ। भुवनेश्वरी देवी के विश्वविजयी पुत्र का स्वागत मंगल शंख बजाकर मंगल ध्वनी से किया गया। ऐसी महान विभूती के जन्म से भारत माता भी गौरवान्वित हुईं। बालक की आकृति एवं रूप बहुत कुछ उनके सन्यासी पितामह दुर्गादास की तरह था। परिवार के लोगों ने बालक का नाम दुर्गादास रखने की इच्छा प्रकट की, किन्तु माता द्वारा देखे स्वपन के आधार पर बालक का नाम वीरेश्वर रखा गया। प्यार से लोग ‘बिले’ कह कर बुलाते थे। हिन्दू मान्यता के अनुसार संतान के दो नाम होते हैं, एक राशी का एवं दूसरा जन साधारण में प्रचलित नाम, तो अन्नप्रासन के शुभ अवसर पर बालक का नाम नरेन्द्र नाथ रखा गया।
नरेन्द्र की बुद्धि बचपन से ही तेज थी।बचपन में नरेन्द्र बहुत नटखट थे। भय, फटकार या धमकी का असर उन पर नहीं होता था। तो माता भुवनेश्वरी देवी ने अदभुत उपाय सोचा, नरेन्द्र का अशिष्ट आचरण जब बढ जाता तो, वो शिव शिव कह कर उनके ऊपर जल डाल देतीं। बालक नरेन्द्र एकदम शान्त हो जाते। इसमे संदेह नही की बालक नरेन्द्र शिव का ही रूप थे।

माँ के मुहँ से रामायण महाभाऱत के किस्से सुनना नरेन्द्र को बहुत अच्छा लगता था। बालयावस्था में नरेन्द्र नाथ को गाङी पर घूमना बहुत पसन्द था। जब कोई पूछता बङे हो कर क्या बनोगे तो मासूमियत से कहते कोचवान बनूँगा। ये कहना अतिश्योक्ती न होगा कि भारतीय संस्कृती को विश्वस्तर पर पहचान दिलाने का श्रेय अगर किसी को जाता है तो वो हैं स्वामी विवेकानंद। व्यायाम, कुश्ती, क्रिकेट आदी में नरेन्द्र की विशेष रूची थी। कभी कभी मित्रों के साथ हास – परिहास में भी भाग लेते। जनरल असेम्बली कॉलेज के अध्यक्ष विलयम हेस्टी का कहना था कि नरेन्द्रनाथ दर्शन शास्त्र के अतिउत्तम छात्र हैं। जर्मनी और इग्लैण्ड के सारे विश्वविद्यालयों में नरेन्द्रनाथ जैसा मेधावी छात्र नहीं है।
नरेन्द्र के चरित्र में जो भी महान है, वो उनकी सुशिक्षित एवं विचारशील माता की शिक्षा का ही परिणाम है।बचपन से ही परमात्मा को पाने की चाह थी।डेकार्ट का अंहवाद, डार्विन का विकासवाद, स्पेंसर के अद्वेतवाद को सुनकर नरेन्द्रनाथ सत्य को पाने का लिये व्याकुल हो गये। अपने इसी उद्देश्य की पूर्ती हेतु ब्रह्मसमाज में गये किन्तु वहाँ उनका चित्त शान्त न हुआ। रामकृष्ण परमहंस की तारीफ सुनकर नरेन्द्र उनसे तर्क के उद्देश्य से उनके पास गये किन्तु उनके विचारों से प्रभावित हो कर उन्हे गुरू मान लिया। परमहसं की कृपा से उन्हे आत्म साक्षात्कार हुआ। नरेन्द्र परमहंस के प्रिय शिष्यों में से सर्वोपरि थे। 25 वर्ष की उम्र में नरेन्द्र ने गेरुवावस्त्र धारण कर सन्यास ले लिया और विश्व भ्रमण को निकल पङे।
अपने व्यख्यान से स्वामी जी ने सिद्ध कर दिया कि हिन्दु धर्म भी श्रेष्ठ है, उसमें सभी धर्मों समाहित करने की क्षमता है।इस अदभुत सन्यासी ने सात समंदर पार भारतीय संसकृती की ध्वजा को फैराया। स्वामी जी केवल संत ही नही देशभक्त, वक्ता, विचारक, लेखक एवं मानव प्रेमी थे। 1899 में कोलकता में भीषण प्लेग फैला, अस्वस्थ होने के बावजूद स्वामी जी ने तन मन धन से महामारी से ग्रसित लोगों की सहायता करके इंसानियत की मिसाल दी। स्वामी विवेकानंद ने, 1 मई, 1897 को रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। रामकृष्ण मिशन, दूसरों की सेवा और परोपकार को कर्मयोग मानता है जो कि हिन्दुत्व में प्रतिष्ठित एक महत्वपूर्ण सिध्दान्त है।
1893 में शिकागो विश्व धर्म परिषद में भारत के प्रतीनिधी बनकर गये किन्तु उस समय युरोप में भारतीयों को हीन दृष्टी से देखते थे। उगते सूरज को कौन रोक पाया है, वहाँ लोगों के विरोध के बावजूद एक प्रोफेसर के प्रयास से स्वामी जी को बोलने का अवसर मिला। स्वामी जी ने बहिनों एवं भाईयों कहकर श्रोताओं को संबोधित किया। स्वामी जी के मुख से ये शब्द सुनकर करतल ध्वनी से उनका स्वागत हुआ। श्रोता उनको मंत्र मुग्ध सुनते रहे निर्धारित समय कब बीत गया पता ही न चला। अध्यक्ष गिबन्स के अनुरोध पर स्वामी जी आगे बोलना शुरू किये तथा 20 मिनट से अधिक बोले। उनसे अभिभूत हो हज़ारों लोग उनके शिष्य बन गये। आलम ये था कि जब कभी सभा में शोर होता तो उन्हे स्वामी जी के भाषण सुनने का प्रलोभन दिया जाता सारी जनता शान्त हो जाती। 

11 सितंबर, 1893 को स्वामी विवेकानंद ने शिकागो पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन में जो भाषण दिया था उसे आज भी लोग याद करते हैं।
अमेरिकी   बहनों  और भाइयों
आपके इस स्नेह्पूर्ण और जोरदार स्वागत से मेरा हृदय आपार हर्ष से भर गया है। मैं आपको दुनिया के सबसे पौराणिक भिक्षुओं कि तरफ से धन्यवाद् देता हूँ।  मैं आपको सभी धर्मों की जननी कि तरफ से धन्यवाद् देता हूँ, और मैं आपको सभी जाति-संप्रदाय के लाखों-करोड़ों हिन्दुओं कि तरफ से धन्यवाद् देता हूँ। मेरा धन्यवाद् उन वक्ताओं को भी जिन्होंने ने इस मंच से  यह कहा है कि दुनिया में शहनशीलता का विचार सुदूर पूरब के देशों से  फैला  है। मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूँ जिसने दुनिया को शहनशीलता और  सार्वभौमिक स्वीकृति  का पाठ पढाया है। हम सिर्फ  सार्वभौमिक शहनशीलता में ही विश्वास नहीं रखते बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं। मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे देश से हूँ  जिसने इस धरती के सभी देशों के  सताए गए लोगों को शरण दी है। मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि हमने अपने हृदय में उन  इस्राइलियों के शुद्धतम स्मृतियाँ बचा कर रख्हीं हैं, जिनके मंदिरों को रोमनों ने तोड़-तोड़ कर खँडहर बना दिया, और तब उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली। मुझे इस बात का गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूँ जिसने महान पारसी देश के अवशेषों को शरण दी और अभी भी उन्हें बढ़ावा दे रहा है। भाइयों मैं आपको एक श्लोक कि कुछ पंक्तियाँ सुनाना चाहूँगा जिसे मैंने बचपन से स्मरण  किया और दोहराया है, और जो रोज करोडो लोगो द्वारा हर दिन दोहराया जाता है। "जिस तरह से विभिन्न धाराओं कि उत्पत्ति विभिन्न स्रोतों से होती है उसी प्रकार मनुष्य अपनी इच्छा के अनुरूप अलग-अलग मार्ग चुनता है, वो देखने में भले सीधा या टेढ़े-मेढ़े लगे पर सभी भगवान तक ही जाते हैं।"
वर्तमान सम्मलेन, जो कि  आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से है, स्वयं में गीता में  बताये  गए एक सिद्धांत का  प्रमाण है, "जो भी मुझ तक आता है,चाहे किसी भी रूप में, मैं उस तक पहुँचता हूँ,सभी मनुष्य विभिन्न मार्गों पे संघर्ष कर रहे हैं जिसका अंत मुझ में है”। सांप्रदायिकता, कट्टरता, और इसके भयानक वंशज, हठधर्मिता लम्बे समय से प्रथ्वी को अपने शिकंजों में जकड़े हुए हैं। इन्होने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है, कितनी बार ही ये धरती खून से लाल हुई है,कितनी ही सभ्यताओं का विनाश हुआ है और कितने देश नष्ट हुए हैं।
अगर ये भयानक राक्षस नहीं होते तो आज मानव समाज कहीं ज्यादा उन्नत होता. लेकिन अब उनका समय पूरा हो चूका है, मुझे पूरी उम्मीद है कि आज इस सम्मेलन का शंख नाद  सभी हठधर्मिता,हर  तरह के क्लेश,चाहे वो तलवार से हों या कलम से, और हर एक मनुष्य,जो एक ही लक्ष्य की तरफ बढ़ रहे हैं, के बीच की  दुर्भावनाओं  का विनाश करेगा। 

39 वर्ष के संक्षिप्त जीवन काल में स्वामी जी ने जो अदभुत कार्य किये हैं, वो आने वाली पिढीयों को मार्ग दर्शन करते रहेंगे। 4 जुलाई 1902 को स्वामी जी का अलौकिक शरीर परमात्मा मे विलीन हो गया।
स्वामी जी का आदर्श- "उठो जागो और तब तक न रुको जब तक मंजिल प्राप्त न हो जाए" अनेक युवाओं के लिये प्रेरणा स्रोत है। स्वामी विवेकानंद जी का जन्मदिन राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। उनकी शिक्षा में सर्वोपरी शिक्षा है "मानव सेवा ही ईश्वर सेवा है।”